लेखक: सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! के अनुसार ,उर्दू अदब में बाज़ लोग लिखते हैं, बाज़ लोग शेर कहते हैं और बाज़ लोग अपने अहद के सोए हुए ज़मीर को आवाज़ देते हैं। पयाम आज़मी का ताल्लुक़ उसी आख़िरी क़बीले से है। उनके यहाँ लफ़्ज़ महज़ इज़हार का वसीला नहीं, बेदारी की क़ुव्वत है; शेर महज़ जमालियाती तजुर्बा नहीं, फ़िक्री इज़्तिराब है और नस्र महज़ मालूमात की तरसील नहीं, ज़ेहन के बंद दरीचों पर दस्तक है। उनकी तहरीर पढ़ते हुए क़ारी सिर्फ़ मुसन्निफ़ के ख़यालात से वाक़िफ़ नहीं होता, वो अपने अंदर मौजूद उस इंसान से भी आश्ना होता है जिसे ज़माने की मसलहतों, आदतों और ख़ामोशियों ने कहीं दबा दिया है।
पयाम आज़मी की असल शनाख़्त उसी फ़िक्री बे-क़रारी में है। वो मुतमइन ज़ेहन के शायर नहीं; सवाल उठाने वाले क़लमकार हैं। उनका मिज़ाज क़ुबूल-ए-आम के सुकून से ज़्यादा हक़ीक़त के इज़्तिराब से वाबस्ता है। यही वजह है कि उनके यहाँ मज़हब महज़ रुसूम का मजमूआ नहीं, एक ज़िंदा फ़िक्री निज़ाम है; कर्बला सिर्फ़ माज़ी का अलमिया नहीं, इंसानी ज़मीर का दाइमी इम्तिहान है; और अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम से मोहब्बत सिर्फ़ जज़्बाती वाबस्तगी नहीं, हक़, अदालत, शुजाअत, आज़ादी और इंसानी करामत के एक मुकम्मल तसव्वुर से वाबस्तगी है।
उनकी शायरी की तह में उतरने के लिए ये समझना ज़रूरी है कि वो वाक़िआ नहीं, उसके बातिन को मौज़ू बनाते हैं। कर्बला उनके लिए सिर्फ़ शहादतों का बयान नहीं बल्कि उस सवाल का नाम है कि इंसान ताक़त के सामने अपनी अख़्लाक़ी आज़ादी कहाँ तक महफ़ूज़ रख सकता है। इसी लिए उनके यहाँ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तारीख़ के एक मुक़द्दस किरदार से आगे बढ़कर एक ज़िंदा मियार बन जाते हैं। उनका मारूफ़ मिसरा;
"चौदह सदियाँ बीत गईं
शब्बीर का चर्चा बाक़ी है"
बज़ाहिर सादा है मगर अपने अंदर तारीख़ का पूरा फ़लसफ़ा समोए हुए है। इक़्तिदार गुज़र जाता है, सल्तनतें मिट जाती हैं, ज़ब्र के ऐवान ख़ाक हो जाते हैं मगर वो किरदार ज़िंदा रहता है जो इंसानियत के बुनियादी उसूलों के लिए क़ुर्बानी दे। यही पयाम आज़मी के शेरी शुऊर की एक बुनियादी जिहत है।
उनके यहाँ इंक़िलाब शोर नहीं, शुऊर है। इंक़िलाब का मतलब महज़ हुकूमत या निज़ाम की तब्दीली नहीं; इंसान के अंदर मियार-ए-हक़ की तब्दीली, निगाह की इस्लाह, ज़मीर की बेदारी और मसलहत के मुक़ाबले में उसूल का इंतिख़ाब भी इंक़िलाब है। यही वजह है कि उनका क़लम किसी एक सियासी नारे का असीर नहीं दिखाई देता। वो इंसान के अंदर इंक़िलाब चाहते हैं; ऐसा इंक़िलाब जिसमें ख़ौफ़ की जगह हुर्रियत, जहालत की जगह मारिफ़त, बे-हिसी की जगह एहसास और जुमूद की जगह हरकत पैदा हो।
पयाम आज़मी की इंक़िलाबी फ़िक्र की एक नुमायाँ ख़ुसूसियत ये है कि वो अक़ीदत को शुऊर से जुदा नहीं करते। अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की मोहब्बत उनके यहाँ महज़ आँखों की नमी नहीं, किरदार की ज़िम्मेदारी है। अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से मोहब्बत इंसान को ज़ुल्म के सामने ख़ामोश रखे तो ऐसी मोहब्बत के मअनी पर सवाल उठना चाहिए। अगर इमाम अली अलैहिस्सलाम का नाम ज़बान पर हो मगर अद्ल ज़िंदगी में न हो तो निस्बत का दावा अपने अंदर एक अख़्लाक़ी ख़ला रखता है। अगर ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा का ज़िक्र हो मगर हक़-गोई, इस्तिक़ामत और इज़्ज़त-ए-नफ़्स ज़िंदगी से ग़ायब हों तो कर्बला अभी हमारे अंदर दाख़िल नहीं हुई। पयाम आज़मी की फ़िक्र का असल हैजान उसी मक़ाम से पैदा होता है जहाँ अक़ीदा किरदार का मुतालबा बन जाता है।
उनकी शायरी में फ़न और फ़िक्र का रिश्ता भी क़ाबिल-ए-तवज्जो है। वो महज़ पैग़ाम को शेर नहीं बनाते; शेर के फ़न्नी इम्कानात से पैग़ाम की तासीर बढ़ाते हैं। उनके कलाम में ख़िताबाना आहंग, मंज़र-आफ़रीनी, तारीख़ी शुऊर और जज़्बाती इर्तिआश एक दूसरे में मुदग़म हो जाते हैं। यही वजह है कि उनका शेर सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, आवाज़ में ज़िंदा होता है। सामे तक पहुँचते हुए मिसरा अपने लफ़्ज़ी वुजूद से आगे बढ़कर एक कैफ़ियत बन जाता है। ये वो मक़ाम है जहाँ मज़हबी शायरी मजलिस की हुदूद से निकल कर अदबी तजुर्बा बन जाती है।
उनके कलाम का एक और वस्फ़ हाफ़िज़े में उतर जाने वाली शेरी साख़्त है। बड़ा शेर हमेशा मुश्किल शेर नहीं होता। कभी एक सादा सा मिसरा सदियों की तारीख़ को अपने अंदर जज़्ब कर लेता है। पयाम आज़मी के यहाँ ऐसे मिसरे मिलते हैं जो किताब से निकल कर ज़बान-ए-ख़ल्क़ का हिस्सा बनने की सलाहियत रखते हैं। यही वो मंज़िल है जहाँ शेर "कलाम" से "याद" बन जाता है, और याद से "शुऊर"।
उनके फ़िक्री मिज़ाज को समझने के लिए उनकी नस्र को भी शायरी के साथ पढ़ना ज़रूरी है। "इस्लाम ही क्यों?" जैसा अज़ीम नस्री शाहकार इस बात की दलील है कि उनके लिए मज़हब महज़ जज़्बाती वाबस्तगी का मौज़ू नहीं बल्कि अक़्ली, कलामी और फ़िक्री सवाल भी है। उनकी शख़्सियत का यही पहलू उन्हें सिर्फ़ शायर के ख़ाने में बंद होने से बचाता है।
पयाम आज़मी के यहाँ क़लम एक ज़िम्मेदारी है। "वल-क़लम" जैसा मजमूआ ख़ुद इस अलामत को नुमायाँ करता है। क़ुरआन ने क़लम की क़सम खाई; इस लिए क़लम उनके लिए महज़ अदबी सनअत नहीं रहता, एक अख़्लाक़ी अमानत बन जाता है। क़लम का काम सिर्फ़ ख़ूबसूरत जुमले पैदा करना नहीं; बातिल के पर्दे चाक करना, सवाल को ज़िंदा रखना और इंसान को उसकी असल ज़िम्मेदारी याद दिलाना भी है।
यही वजह है कि पयाम आज़मी की तहरीर में कभी कभी एक ऐसा हैजानी आहंग पैदा होता है जो क़ारी को आराम से पढ़ने नहीं देता। उनके अलफ़ाज़ सवाल करते हैं, सवाल जवाब का तक़ाज़ा करता है और जवाब इंसान को ख़ुद अपने सामने ला खड़ा करता है। यही अदब की बुलंद तरीन मंज़िलों में से एक है: जब मुसन्निफ़ ख़त्म हो जाता है और क़ारी के अंदर मुकालिमा शुरू हो जाता है।
उनकी शख़्सियत को सिर्फ़ मज़हबी अदब के एक मारूफ़ नाम के तौर पर देखना भी उनके फ़िक्री दाइरे को महदूद करना होगा। उनके यहाँ इंसान एक ज़िंदा मसला है। उसकी आज़ादी, उसकी इज़्ज़त, उसका इंतिख़ाब, उसकी अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी और उसका तारीख़ी शुऊर ये सब उनके फ़िक्री मंज़रनामे का हिस्सा हैं। इसी लिए उनके यहाँ मज़हब और इंसानियत एक दूसरे से मुतसादिम नहीं होते; मज़हब इंसान को उसकी हक़ीक़ी क़दर से आश्ना करने का ज़रिया बन जाता है।
पयाम आज़मी की फ़िक्र में ग़ैरत भी एक बुनियादी अख़्लाक़ी क़दर है मगर ये ग़ैरत जज़्बाती इश्तिआल नहीं। ये उस शुऊर का नाम है जिसके बाद इंसान ज़ुल्म को मामूल, ज़िल्लत को तक़दीर और ख़ामोशी को हिकमत समझने से इनकार कर दे। उनके यहाँ ग़ैरत का मतलब तलवार उठाना नहीं, पहले अपने अंदर वो अख़्लाक़ी क़ुव्वत पैदा करना है जो हक़ को पहचान सके और फिर उसकी क़ीमत अदा करने का हौसला भी रखे।
यहाँ उनकी शायरी कर्बला से एक गहरा रिश्ता क़ाइम करती है। कर्बला का सबसे बड़ा सबक़ शायद यही है कि इंसान को हर अहद में ये फ़ैसला करना पड़ता है कि वो आसान ज़िंदगी चाहता है या दुरुस्त ज़िंदगी। पयाम आज़मी का क़लम इस इंतिख़ाब को नरम नहीं करता; इसे महसूस कराता है। इसी लिए उनका कलाम बाज़ औक़ात क़ारी के लिए ख़ुशगवार नहीं बल्कि बे-आराम करने वाला तजुर्बा बन जाता है। और शायद एक बेहतरीन अदब की यही एक पहचान है कि वो हमें हमेशा सहलाता नहीं, कभी कभी हमारी सहूलत छीन लेता है।
पयाम आज़मी के यहाँ ज़बान भी उसी मक़सद की ताबे है। वो इल्मी बात को ख़ुश्क इस्तिलाहात में क़ैद नहीं करते और जज़्बात को फ़िक्री गहराई से महरूम नहीं होने देते। उनके यहाँ फ़िक्र शेर में आती है तो मौसीक़ियत इख़्तियार करती है और जज़्बा नस्र में आता है तो इस्तिदलाल पैदा करता है। यही इम्तिज़ाज उनकी अदबी शख़्सियत को मुनफ़रिद बनाता है।
उनके कलाम में तारीख़ सिर्फ़ याद करने की चीज़ नहीं; अपने ज़माने को समझने का आईना है। माज़ी उनके यहाँ फ़रार का रास्ता नहीं बल्कि हाल की तफ़हीम का वसीला है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को याद करना इस लिए अहम नहीं कि एक अज़ीम वाक़िआ कभी पेश आया था; इस लिए अहम है कि हर अहद में ज़ुल्म नई ज़बान, नया लिबास और नए जवाज़ के साथ सामने आ सकता है। कर्बला को ज़िंदा रखने का मतलब उसी इंसानी सवाल को ज़िंदा रखना है।
इसी मक़ाम पर पयाम आज़मी का अदब महज़ मज़हबी अदब नहीं रहता; वो इंसानी ज़मीर का अदब बन जाता है।
उनकी इंक़िलाबी क़ुव्वत का सरचश्मा भी यही है। वो इंसान को भीड़ और हुजूम का हिस्सा नहीं देखना चाहते; उसे साहिब-ए-शुऊर फ़र्द बनाना चाहते हैं। ऐसा फ़र्द जो रिवायत का एहतिराम करे मगर तक़लीद का ग़ुलाम न हो, अक़ीदे से वाबस्ता हो मगर सवाल करने से न डरे, तारीख़ से मोहब्बत करे मगर तारीख़ के नाम पर ज़ुल्म को मुक़द्दस न बनाए, और मज़हब को माने तो उसके अख़्लाक़ी मुतालबात भी क़ुबूल करे।
यही वो मक़ाम है जहाँ पयाम आज़मी का क़लम आज के अहद से बराहे-रास्त मुकालिमा करता है।
आज जब अलफ़ाज़ बहुत हैं मगर मअनी कम, मालूमात बहुत हैं मगर बसीरत कम, शोर बहुत है मगर समाअत कम, वाबस्तगियाँ बहुत हैं मगर किरदार कम ऐसे ज़माने में पयाम आज़मी की आवाज़ की अहमियत बढ़ जाती है। वो हमें याद दिलाते हैं कि अदब का मक़सद सिर्फ़ दिल बहलाना नहीं; कभी कभी दिल को बे-चैन करना भी अदब की ख़िदमत है। फ़िक्र का मक़सद सिर्फ़ मालूमात बढ़ाना नहीं; कभी कभी इंसान के यक़ीन की बुनियादों को हिला कर उसे ज़्यादा पुख़्ता यक़ीन तक पहुँचाना भी फ़िक्र का काम है।
पयाम आज़मी उसी बे-क़रारी के शायर हैं।
वो लफ़्ज़ को महज़ लफ़्ज़ नहीं रहने देते।
उसमें सवाल रखते हैं।
सवाल में इज़्तिराब।
इज़्तिराब में शुऊर।
और शुऊर में अमल की इम्कान-पज़ीरी।
यही उनकी अदबी शख़्सियत का जौहर है।
इसी लिए पयाम आज़मी को पढ़ना सिर्फ़ एक शायर को पढ़ना नहीं; अपने अंदर मौजूद सोए हुए इंसान को आवाज़ देना है।
और शायद एक सच्चे साहिब-ए-क़लम के लिए इस से बड़ी कामयाबी कोई नहीं कि उसके बाद क़ारी किताब बंद करे, मगर उसके अंदर मौजूद सवाल बंद न हो।
पयाम आज़मी का असल पैग़ाम शायद यही है: लफ़्ज़ वही ज़िंदा है जो इंसान को उसके ज़मीर से मिला दे।
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